Subscribe to Aman Kumar Beriwal

Thursday, October 11, 2012

जब भी ज़िक्र होगा मोहब्बत का ...

समेट लू इन गुज़रते लम्हो को 
अपने मन के किसी कोने मे.. 
ये याद आएँगे हर दूं..
जब भी ज़िक्र होगा मोहब्बत का ...

कि तुम थे एक कोशिश मे.. 
साथ मेरे चलने की..
मेरी रफ़्तार पकड़ने की..
ना थी कोई भावना स्वार्थ की...

इतना अनोखी चाहत..
ना कभी देखी ना कहीं सुनी..
अफ़सोस है मुझे की
ये एक कहानी ना बनी...

तुम्हारी शिकायत कि..
मिलते नही हो ख्वाब मे भी..
मैं असमंजस मे हू..
कि मिल कर नज़ारे कैसे मिलाऊ..
डरता हू खुद से ...
तेरा सामना कैसे कर जाऊ..

साथ चलना मुमकिन नही है..
कसूर कहीं ना कहीं मेरा ही है..
कमजोर नही है मोहब्बत तेरी...
मैं ही हरा हुआ हू खुद से...

याद आएँगे लम्हे तेरे साथ के..
जब भी ज़िक्र होगा मोहब्बत का...

कुछ बाते


कभी रास्तो पर जो मुलाकात हो जाए तुमसे...
नज़र मिला कर फिरा लेना अजनबी हो जैसे..
मेरी एकटक देखती आँखो के चुभते सवालो से..
कही खुद को तुम घायल ना कर लो..

Thursday, October 4, 2012

एक ढके चेहरा का नकाब उतार कर दिखलाता हू..


बँधी है बेड़ियाँ कुछ वो फिर से तुम्हे सुनाता हू.,.
एक ढके चेहरा का नकाब उतार कर दिखलाता हू..

खादी पहन डाकू भी संसद मे पहुँच जाता है..
ओर एक व्यंग करने वाला कलाकार... जेलो मे मिल जाता है..
सीना छलनी करने वाले को.. बिरयानी खिलाई जाती है..
ओर शहीदो की माओ को .. दफ़्तरो की धूल चटाई जाती है
भगत सिंग ओर राजगुरु की कुर्बानी पल पल यहाँ रोती है..
जब सियासत लोगो मे नफ़रत के बीज बोती है..
मैं फिर तुमसे एक बार भारतीयता के बात बताता हू..
क्या हो तुम आज तुम्हारा तुमसे परिचय करवाता हू..

जी रहे हो तुम यहाँ.. वो जीवन बेमानी है..
परंपरा की एक अनसुलझी  कोई कहानी है..
कोई गैर रोज़ तुम्हारा खून चूसने जब आता है..
अपना ही कोई आगे बढ़ उसे फूलो का हार पहनता है..
अपनो के हाथ काट कर.. बेच देता है बाज़ारो मे..
भूखा देश नज़र आता सुबह शाम नज़ारो मे..
बिक जाती है रूह जहाँ.. उस मॅंडी से तुम्हे मिलवाता हू..
एक ढके चेहरा का नकाब उतार कर दिखलता हू..

Monday, September 17, 2012

कुछ बाते

1) 
जब नीली आँखो का सागर
खींचता अपनी ओर हर लहर के साथ... 
कदम जम जाते है ..
आख़िर कभी इनमे डूबने की चाह रखने वाला
आज काश्तियों के सहारे किनारे खोजा करता है...

2)
अजनबी है हसीन वादियाँ यहाँ यो
जो दिल खोल कर बात नही करती दो पल के लिए भी..
एक मिट्टी है मेरे देश की..
जहाँ पतझड़ भी हंसते हुए निकल जाता है,...

Saturday, September 8, 2012

यूँ मेरा देश भी मेरा अपना नही,,,,


कहने को दुनिया मुट्ठी में हैं अपने,,
यूँ मेरा देश भी मेरा अपना नही,,,,
जिन की खातिर कितने कुर्बान हो गये हंसते हंसते..
 मेरी आँखो मे आज वो सपना नही..

मैं लड़ जाऊँगा धर्म के नाम पर..
पर वतन के लिए चेतना मुझे आती नही ..
गुलामी की जंजीरो की आदत मुझको..
दो साँसे आज़ादी की मुझे सुहाति नही...

अच्छा है यदि लड़े दो चार प्रांत के नाम पर,,,
अपना कुछ तो भला होगा..
अपने घर मे आग लगा सोचता में..
आख़िर इससे घर पड़ोसी का भी तो जला होगा...

पढ़ाई पर बच्चो को देकर लालच नयी साइकल का...
महफ़िलो मे भ्रष्टाचार पर मैं बतियता हू...
जब घड़ी आती है ईमान परखने की..
चंद सिक्को से मैं परीक्षा से ही बच जाता हू..

मैं लड़ता हू आरक्षण पर..
पानी ओर रोटी की लड़ाई से भला मुझे क्या करना..
काम है मेरा नारेबाज़ी करना आख़िर..
उसी से शाम को मेरे घर का चूल्हा है जलना...

यूँ ताक़त है मुझमे ज़माने से भीड़ जाने की..
प्रेमियो को सरे आम मार कर.. सभी समाज बनता हू...
और जब कोई मुझसे मेरे हक मार ले जाता है..
मैं मजबूरी का बस झुन्झुना बजता हू...

ये मैं इस अंजान का भी हिस्सा है..
शायद एक दूसरे का यही एक किस्सा है...
मत समझना मेरा उद्देशय है सिर्फ़ व्यंग्य..
मैं तो आत्मा मेरी जगाना चाहता हू..
देश के लिए मर मिटे जो..
शब्दो के सहारे एक ऐसे पीढ़ी बनाना चाहता हू...