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Saturday, December 3, 2011

नादानी लम्हो की

गुज़रते लम्हे
मुझे अचरज से घूरते हुए..
आँसू है जो पलको पर..
उन आँसुओ को पोंछते हुए...
एक दर्द अपन बयान करते है

मिला था एक राही उन्हे भी
अपने वक़्त को कोसता हुआ
चल रहा था मायूस वो.
आँखो मैं बुझे सपने लिए..
वो भी अपनी मंज़िलो से मिलते है


गुज़रते लम्हे
मुझे धीरे से समझाते हुए
लड़ कर लिखी जाती जब तकदीर..
अहसास करती वो सुकून का
जैसे नासूर जख्म पर मरहम कभी मलते है

इतना सुनकर मैं भी
अपने कहानी बयान करता हू
गम नही है पलको पर है जो
ये है पैगाम किसी के मिलने का..
नज़र आता है ये जब पत्थर दिल पिघलते है


पलको पर आकर थम गया है जो
वो खुशियाँ है किसी के घर आने की..
यकीन आता है हक़ीकत का इससे.
ये प्रमाण है उसकी मोहब्बत का..
इस पल के लिए तो दिल बरसो तरसते है..



सुनकर मेरा तराना
समझ आया लम्हो को की
फ़ितरत है आँसुओ की बहना
कभी खुशी कभी गम के
ये हमेशा पलको पर ही मिलते है

-- By Anjaan

Friday, December 2, 2011

सवाल

अंगड़ाई लेती शाम पूछती है मुझसे..

की क्यों उसका तू इंतज़ार करता है...

क्यों अपनी ज़िंदगी को

उसके गम मे बेकार करता है..

कह देता हू शाम से मैं भी..

कि बेवजह नही है इंतज़ार मेरा..

ये भी एक अदा है अंजान की..

जो उनकी बेवफ़ाई से भी प्यार करता है..


महकता गुलिस्ताँ अक्सर पूछता है..

कि क्यों तू अपनी खुशबू खोता है..

बावरा है अंजान तू..

जो उसकी यादो के संग सोता है..

कहता हू मैं गुलिस्ताँ से..

पागल है फिर तो तू भी क्योंकि

फूल चाहे हो मुरझाए

टूटने पर उनके दर्द तुझको भी होता है


बहती हुई ठंडी हवा का झोंका..

कहता मुझसे की मैं उसे भुला दू..

लालच देता वो मुघे संग ले चलने का

कहता की आ दुनिया की सैर करा दू..

हंस पड़ता है उसकी इस नादानी पर..

ओर नासमझ से पूछता अंजान.

  कि यदि मिला सकता है तो मिला दे मेरे महबूब से..

फिर देख तुझे मैं जन्नत की सैर करा दू..



आवारा बदल भी अब तो

एक सवाल सा पूछ जाता है...

क्यों उसकी तू उसे नही भूल पता

याद मे जिसकी तू सारा जहाँ भूल जाता है

 समझाओ कोई इन बादलो को..

पूछते मुझसे ये वजह भूलने की..

की मोहब्बत है ये कोई सौदा नही..

ये जहाँ क्या यहाँ अंजान अपना वजूद भूल जाता है

मुलाकात

महफ़िलो का दौर था.. जब उनसे नज़र लगी..

हुई तेज धड़कने दिलो की.. एक अजीब से कसक जगी..

आँखो मे था नशा उनके ओर जानी पहचानी सूरत लगी,,

उलझ गया अंजान सवाल मे की ..दिल्लगी है या दिल की लगी..

माँ

चुपके से सुबह को उठाती वो

प्यार से बालो को सहलाती वो

तकलीफो मे भी मुस्कुराती वो..

उंगली पकड़ चलना सीखती वो..

तेरी हर बुराई को छिपाती वो..

तुझे अच्छा इंसान बनाती वो..

ग़लती पर तुझे डाँट्ती वो..

रूठने पर फिर मनाती वो..

पहचान तेरी एक बनाती वो..

मुश्किलो मे रास्ता दिखलाती वो..

तेरी हँसी पर अपना सब लुटाती वो..

सूरत तेरी आँखो मे बसाती वो..

निस्वार्थ प्यार की मूरत है जो

माँ कहते है अंजान उसको..

Thursday, December 1, 2011

ज़िंदादिली

नही मिलता आसमा पँखो के होने से..

मिलता है ये हॉंसलो की उड़ानो से


किनारे की लहरो से जो डर जाए..

क्या लड़ेगा वो समुंदर के तूफ़ानो से..


पतझड़ को देख मन डोल गया तेरा

बाकी है मिलना अभी रेगिस्तान के वीरानो से


चोट बाकी है अभी तो तेज तलवारो की..

ज़ख्म पड़े है अभी सिर्फ़ म्यानो से..


इंतज़ार कर रहा तू एक मदद का पर.

नही चलती ज़िंदगी दूसरो के अहसानो से .



खवाहिश तेरी सपनो की चादर मे सोने की..

नींद नही आती जब काँटे मिले सिरहानो से..


ज़िक्र करता तू तल्ख़ धूप का हर पल

सीख कुछ हर पल जलते परवानो से..


ज़रूरत नही रास्तो की मंज़िलो के लिए..

अंजान बन जाते है ये जिन्ददिल अरमानो से..


नही मिलता आसमा पँखो के होने से..

मिलता है ये हॉंसलो की उड़ानो से