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Saturday, December 31, 2011

जन्नत से अज़ीज है तू..

तुझे खो कर पाया है जो..
दुनिया की नज़र मैं जन्नत हैं

जन्नत से अज़ीज है तू..
मेरी दुआओ की मन्नत है..

उलझानो मे हू कि
हाल ए दिल बयाँ कैसे हो

कसम्कश है सब कह देने की पर.
चाँद लॅफ्ज़ो मे ये बयाँ कैसे हो...

नही भूल पाता हू आज भी..
तुम्हारा वो धीरे से मुस्कुराना..

मुझको अपने इंतेज़ार मैं जगा कर..
खुद गहरी नींद सो जाना...

किसे बताऊ अब मैं बाते अपनी..
किसकी बातो को सांसो की रवानी बनाऊ

किसे बनाऊ चैन अब आँखो का
किन मुलाक़ातो की अब एक कहानी बनाऊ


तुझे खो कर पाया है जो..
दुनिया की नज़र मैं जन्नत हैं

जन्नत से अज़ीज है तू..
मेरी दुआओ की मन्नत है..

Thursday, December 29, 2011

जो होता पास तू मेरे..


जो होता पास तू मेरे..
दिन गुज़रता..
पकड़े तेरा हाथ
तस्वीर होती आँखो मे हर शाम
सपनो का बिस्तर पर जब सोता

जो होता पास तू मेरे..
ना होती सुबह..
इतनी अकेली..
ना हर शाम..
चुपके से मैं कहीं रोता..


जो होता पास तू मेरे..
जीता मैं भी
हर पल एक नयी मौज़ से.
मरने से पहले
यू एक लाश ना बना होता..


जो होता पास तू मेरे..

Monday, December 26, 2011

अभी तो मुझे बहुत दूर जाना है..

ज़िंदगी का यूँ साथ निभाना है..
अभी तो मुझे बहुत दूर जाना है..

वादे किए थे किसी से जो..
अभी तो मुझे उनको निभाना है..

चला था जब घर से कल
देखा था एक सपना किसी के पलको पर

थाम कर रखना है उसे आँखो मे
उस सपने को अभी पूरा कर दिखना है..

कैसे थम जाऊ अभी से..
कर्ज़ है अभी बाकी कुछ मुझ पर

मिला है जो अब तक इस ज़िंदगी से
अभी उस का एक मोल चुकाना है..


ज़िंदगी का यू साथ निभाना है..
अभी तो मुझे बहुत दूर जाना है..

Sunday, December 25, 2011

बस कुछ दूर ओर

सन्नाटा है पैर फैलाए हुए..
ना कोई कसक है ना कोई आवाज़..

खामोशी इतनी है की..
हवा भी सुनाई देती है.....
 
 
बस कुछ दूर ओर..
एक रोशनी नज़र आती हुई..

अंधेरे के आँचल से झाँकती हुई..
एक परछाई दिखाई देती है..

बस कुछ दूर ओर..
कोई मुझे पुकारता हुआ,,

उड़ाती सन्नाटे के बिखरे बादल को..
एक आवाज़ सुनाई देती है..

मिला दे कोई उस परछाई से
मिला दे कोई उस आवाज़ से

नसो मे जो घुलती हुई..
लहू बन बहती दिखाई देती है

बुनियाद

लड़ते है सब धर्म के नाम से..
भला कहीं धर्म भी बुरा होता है..
कसूर नही है ये किसी धर्म का..
स्वार्थ तो इंसान का ही बुरा होता है


कमजोर कहते हम दूसरो की बुनियाद को..
नीचा दिखाते दूसरो के मान को..
कमज़ोर नही बनती बुनियाद कभी ज्ञान की..
यकीन उस पर इंसान का ही कमज़ोर होता है..

खो देगा इस वजूद तू अपना ..
बदलने मे जो अब देर लगाई..
रखना नज़रिया अपना कुछ इस तरह की
मिटा दे जो फ़ासले सब वो ही सच्चा इंसान होता है..