Subscribe to Aman Kumar Beriwal

Monday, September 17, 2012

कुछ बाते

1) 
जब नीली आँखो का सागर
खींचता अपनी ओर हर लहर के साथ... 
कदम जम जाते है ..
आख़िर कभी इनमे डूबने की चाह रखने वाला
आज काश्तियों के सहारे किनारे खोजा करता है...

2)
अजनबी है हसीन वादियाँ यहाँ यो
जो दिल खोल कर बात नही करती दो पल के लिए भी..
एक मिट्टी है मेरे देश की..
जहाँ पतझड़ भी हंसते हुए निकल जाता है,...

Saturday, September 8, 2012

यूँ मेरा देश भी मेरा अपना नही,,,,


कहने को दुनिया मुट्ठी में हैं अपने,,
यूँ मेरा देश भी मेरा अपना नही,,,,
जिन की खातिर कितने कुर्बान हो गये हंसते हंसते..
 मेरी आँखो मे आज वो सपना नही..

मैं लड़ जाऊँगा धर्म के नाम पर..
पर वतन के लिए चेतना मुझे आती नही ..
गुलामी की जंजीरो की आदत मुझको..
दो साँसे आज़ादी की मुझे सुहाति नही...

अच्छा है यदि लड़े दो चार प्रांत के नाम पर,,,
अपना कुछ तो भला होगा..
अपने घर मे आग लगा सोचता में..
आख़िर इससे घर पड़ोसी का भी तो जला होगा...

पढ़ाई पर बच्चो को देकर लालच नयी साइकल का...
महफ़िलो मे भ्रष्टाचार पर मैं बतियता हू...
जब घड़ी आती है ईमान परखने की..
चंद सिक्को से मैं परीक्षा से ही बच जाता हू..

मैं लड़ता हू आरक्षण पर..
पानी ओर रोटी की लड़ाई से भला मुझे क्या करना..
काम है मेरा नारेबाज़ी करना आख़िर..
उसी से शाम को मेरे घर का चूल्हा है जलना...

यूँ ताक़त है मुझमे ज़माने से भीड़ जाने की..
प्रेमियो को सरे आम मार कर.. सभी समाज बनता हू...
और जब कोई मुझसे मेरे हक मार ले जाता है..
मैं मजबूरी का बस झुन्झुना बजता हू...

ये मैं इस अंजान का भी हिस्सा है..
शायद एक दूसरे का यही एक किस्सा है...
मत समझना मेरा उद्देशय है सिर्फ़ व्यंग्य..
मैं तो आत्मा मेरी जगाना चाहता हू..
देश के लिए मर मिटे जो..
शब्दो के सहारे एक ऐसे पीढ़ी बनाना चाहता हू...

Wednesday, August 29, 2012

कुछ बाते


जलना है काम उसका.. वो दो पल की ज़िंदगी से ही खुश है..
सागर किनारे की तरह अपनी खामोशी मे ही खुश है..
गम नही की मिला ना साथ तेरा मेरी मंज़िल की राहो पर..
साथ बीते चाँद पॅलो की अंजान बंदगी से ही खुश है...

पर सपना मेरा बिखर जाता है..


कहीं दूर
क्षितीज़ के पास...
 जहाँ ये आसमान..
धरती से मिल जाता है...

उसी तरह अंत मे
मेरी सोच के हाशिए पर
तेरा मेरा रिश्ता..
हमेशा ही जुड़ जाता है..

समझता है कोई..
कि मैं बीते कल को
अपने मुट्ठी मे
दबाकर साथ चल रहा है..

पर जब
हौंसला देने वाला साथ नही
आगे चलता हुआ अनजान फिर
पीछे मूड जाता है..

पर ये तो कल है
आख़िर बीत चुका है
जो बस अब मैं
देख सकता हू दूर से ही

छूने की कोशिश मे
उस सुंदर लम्हो की दर्शनि को..
मैं हो जाता हू बेसूध अक्सर...
पर सपना मेरा बिखर जाता है..

Monday, August 27, 2012

मैं


मध्यम मध्यम पूर्वा..
अटखेलियाँ करती हुई..
एक जोश भरते हुई..

कंपकपाते हुए  शब्द मेरे..
अब एक आवाज़ बनने लगे है..

मैं भी तो हू झोंका,,
इस मनचली हवा का आख़िर..
सारी हदे तोड़ कर...
अब तूफ़ानो की तरह बहने लगा हू...

मैं उन्मुक्त हो चुका हू फिर अब..
की ज़ंज़ीरे बंदिशो की स्वयं खुलने लगी है..
मैं भँवरा बन अब
इच्छुक फूलो पर रहने लगा हू...


कई मौसम आ चुके है..
कई मौसम अभी आने की राह देख रहा मैं..
शुष्क भी है कुछ.. ओर कुछ तरल भी...
बस अब मैं लग रहा की ये  मैं भी था कहीं..